आंदोलनकारी नेहा बोरा के निजी मुचलका मामले में दिल्ली हाई कोर्ट में सुनवाई पूरी हो गई है। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, मामले में अगले दिन फैसला सुनाए जाने की बात कही गई है।
नेहा बोरा ने स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (SEM) की ओर से जारी उस नोटिस को चुनौती दी है, जिसमें उन्हें शांति बनाए रखने के लिए 10 हजार रुपये का निजी मुचलका और एक जमानतदार देने को कहा गया है।
नेहा बोरा के वकील ने क्या दलील दी?
नेहा बोरा की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने दलील दी कि उन्होंने केवल मंडी हाउस में लोगों को जुटने की अपील की थी। उनके मुताबिक, प्रदर्शन के लिए की गई अपील में हिंसा, कानून तोड़ने या सार्वजनिक व्यवस्था बिगाड़ने का आह्वान नहीं किया गया था।
वकील ने यह भी कहा कि नेहा बोरा को 16 अक्टूबर को प्रदर्शन स्थल पर पहुंचने के कुछ ही समय बाद हिरासत में ले लिया गया था। उन्होंने हिरासत के दौरान वकील और परिवार से संपर्क करने के अधिकार से जुड़े सवाल भी उठाए।
राज्य सरकार ने क्या कहा?
राज्य सरकार की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) चेतन शर्मा ने दलील दी कि संबंधित समय पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के तहत प्रतिबंधात्मक आदेश लागू था। उन्होंने कहा कि शांति भंग होने की आशंका और मौके पर पुलिस व्यवस्था से जुड़े हालात को देखते हुए एहतियाती कार्रवाई जरूरी थी।
राज्य सरकार ने यह भी कहा कि मजिस्ट्रेट ने नोटिस जारी करने से पहले जनरल डायरी की एंट्री, पूर्व में दर्ज FIR और अन्य उपलब्ध जानकारी पर विचार किया था। एएसजी ने नेहा बोरा के खिलाफ पहले दर्ज मामलों का भी उल्लेख किया।
कोर्ट ने उठाए प्रक्रिया से जुड़े सवाल
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने सवाल किया कि क्या मजिस्ट्रेट ने नोटिस जारी करने से पहले उपलब्ध जानकारी की स्वतंत्र रूप से जांच की थी। अदालत ने यह भी पूछा कि क्या केवल नारे लगाने की जानकारी के आधार पर कार्रवाई की जा सकती है और क्या निजी मुचलका मांगने का निर्णय उचित प्रक्रिया के तहत लिया गया था।
कोर्ट ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संविधान के अनुच्छेद 21 से जुड़े पहलुओं पर भी चर्चा की। सुनवाई में BNSS की धारा 126, 130 और 135 के प्रावधानों पर दलीलें रखी गईं।
अब फैसले पर नजर
नेहा बोरा की याचिका में निजी मुचलका और जमानतदार देने से संबंधित नोटिस को चुनौती दी गई है। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद दिल्ली हाई कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया है। अब मामले में अदालत के निर्णय का इंतजार है।
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