पश्चिम एशिया संकट और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के बीच भारतीय रुपया अब सिर्फ डॉलर के मुकाबले ही नहीं, बल्कि चीन की करेंसी युआन के मुकाबले भी कमजोर होता जा रहा है। जनवरी से अब तक रुपया युआन के मुकाबले करीब 8 प्रतिशत तक गिर चुका है, जिसका असर भारत की अर्थव्यवस्था और आम लोगों की जेब पर पड़ सकता है।
भारत हर साल चीन से बड़े पैमाने पर सामान आयात करता है। इनमें इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, सोलर इक्विपमेंट और कई जरूरी प्रोडक्ट शामिल हैं। रुपया कमजोर होने के कारण अब इन्हीं सामानों को खरीदने के लिए भारत को ज्यादा पैसे खर्च करने पड़ रहे हैं। इससे आयात महंगा हो रहा है और महंगाई बढ़ने का खतरा भी गहरा गया है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, अगर साल 2025 में भारत ने चीन से करीब 120 अरब डॉलर का आयात किया और रुपया 7 प्रतिशत कमजोर हुआ, तो देश पर लगभग 70 से 75 हजार करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत का चीन से आयात लगातार बढ़ रहा है, जबकि निर्यात काफी कम है। इसी वजह से ट्रेड डेफिसिट बढ़ रहा है और रुपये पर दबाव बना हुआ है। इसके अलावा कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और विदेशी निवेशकों की बिकवाली भी रुपये की कमजोरी की बड़ी वजह मानी जा रही है।
हालांकि RBI और केंद्र सरकार रुपये को संभालने के लिए कई कदम उठा रहे हैं। विदेशी निवेश बढ़ाने, लोकल करेंसी ट्रेड को बढ़ावा देने और ऊर्जा आयात को डायवर्सिफाई करने जैसे प्रयास किए जा रहे हैं। लेकिन अगर हालात ऐसे ही बने रहे, तो आने वाले समय में चीन से आने वाले इलेक्ट्रॉनिक्स और मशीनरी समेत कई सामान और महंगे हो सकते हैं।
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