दुनिया की अर्थव्यवस्था इस समय गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है। International Monetary Fund की ताज़ा रिपोर्ट ने आने वाले वर्षों के लिए एक चिंताजनक तस्वीर पेश की है।
IMF की ‘फिस्कल मॉनिटर’ रिपोर्ट के अनुसार, साल 2029 तक वैश्विक सरकारी कर्ज दुनिया की कुल GDP के 100% तक पहुंच सकता है। इसका सीधा अर्थ है कि दुनिया जितना एक साल में उत्पादन करती है, उतना ही कर्ज उसके ऊपर बकाया हो सकता है।
रिपोर्ट के मुताबिक, इस तरह की स्थिति आखिरी बार World War II के बाद देखने को मिली थी। हालांकि मौजूदा हालात उस समय से भी ज्यादा जटिल माने जा रहे हैं, क्योंकि आज केवल युद्ध ही नहीं, बल्कि महंगाई, ऊंची ब्याज दरें और बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव भी आर्थिक दबाव बढ़ा रहे हैं।
पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण तेल और गैस की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। इससे सरकारों पर अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है। कई देश अपने नागरिकों को राहत देने के लिए सब्सिडी दे रहे हैं, जिसके लिए उन्हें और अधिक कर्ज लेना पड़ रहा है।
इसके अलावा, बढ़ती ब्याज दरों ने भी समस्या को गंभीर बना दिया है। उच्च ब्याज दरों के चलते सरकारों के लिए पुराने कर्ज का भुगतान करना और नया कर्ज लेना दोनों महंगा हो गया है। रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक GDP में ब्याज भुगतान का हिस्सा 2% से बढ़कर 3% तक पहुंच चुका है।
IMF ने यह भी चेतावनी दी है कि इस स्थिति का सबसे ज्यादा असर विकासशील और गरीब देशों पर पड़ेगा। जिन देशों की अर्थव्यवस्था पहले से कमजोर है या जो तेल आयात पर निर्भर हैं, उनके लिए कर्ज का बोझ और अधिक बढ़ सकता है।
हालांकि, इस चुनौतीपूर्ण वैश्विक माहौल के बीच भारत को एक “ब्राइट स्पॉट” के रूप में देखा गया है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने अपने खर्चों पर नियंत्रण रखते हुए राजकोषीय स्थिति में सुधार किया है। मजबूत आर्थिक वृद्धि के चलते आने वाले समय में भारत के कर्ज-से-GDP अनुपात में स्थिरता या कमी आने की उम्मीद है।
फिलहाल, भारत का कर्ज-GDP अनुपात लगभग 84% के आसपास है, जबकि अमेरिका और चीन जैसे बड़े देशों का कर्ज इससे कहीं अधिक रहने का अनुमान है।
ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि क्या दुनिया इस बढ़ते कर्ज के बोझ से बाहर निकल पाएगी, या फिर वैश्विक अर्थव्यवस्था एक नए संकट की ओर बढ़ रही है।
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