मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के बीच अमेरिका और ईरान के बीच 45 दिन के संभावित सीजफायर (युद्धविराम) को लेकर बातचीत तेज हो गई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह समझौता क्षेत्रीय मध्यस्थ देशों की मदद से किया जा रहा है, ताकि आगे एक स्थायी शांति समझौते का रास्ता तैयार किया जा सके।
प्रस्तावित योजना दो हिस्सों में बंटी हुई है:
अगर बातचीत में ज्यादा समय लगता है, तो सीजफायर को आगे भी बढ़ाया जा सकता है।
हाल के दिनों में संघर्ष तेजी से बढ़ा है। मिसाइल और ड्रोन हमलों ने पूरे क्षेत्र को अस्थिर कर दिया है। खासतौर पर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) को लेकर तनाव बढ़ गया है, जो दुनिया के तेल सप्लाई का बड़ा रास्ता है।
तेल की कीमतें 110 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुकी हैं, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ गया है। सप्लाई चेन प्रभावित हो रही है और कई देशों में महंगाई बढ़ने का खतरा है।
सीजफायर बातचीत में कई देश अहम भूमिका निभा रहे हैं, जिनमें शामिल हैं:
ये देश दोनों पक्षों से संबंध रखते हैं, इसलिए बातचीत को आगे बढ़ाने में मदद कर रहे हैं।
हालांकि बातचीत जारी है, लेकिन कई बड़ी बाधाएं सामने हैं:
इन कारणों से यह सीजफायर कब और कितना सफल होगा, इस पर सवाल बने हुए हैं।
यह समुद्री मार्ग दुनिया के तेल परिवहन का सबसे महत्वपूर्ण रास्ता है।
ईरान द्वारा इसे ब्लॉक करने की धमकी से वैश्विक ऊर्जा बाजार में भारी उथल-पुथल मच गई है।
भारत के लिए यह संकट बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि देश अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा मिडिल ईस्ट से आयात करता है।
अगर सप्लाई बाधित होती है, तो:
विशेषज्ञों के मुताबिक तीन संभावनाएं हैं:
फिलहाल पूरी दुनिया की नजर इस संभावित समझौते पर टिकी हुई है।
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