बिहार के एक छोटे से गांव से निकलकर Commonwealth Games के मंच तक पहुंचने वाले पैरा पावरलिफ्टर झंडू कुमार ने संघर्ष, मेहनत और दृढ़ संकल्प की मिसाल पेश की है। आर्थिक तंगी के बावजूद उन्होंने अपने सपनों का साथ नहीं छोड़ा और देश के लिए पदक जीतकर लाखों युवाओं को प्रेरित किया।
झंडू कुमार का परिवार सब्जियां बेचकर अपना गुजारा करता था। खेल के प्रति उनका जुनून इतना मजबूत था कि ट्रेनिंग और डाइट का खर्च पूरा करने के लिए उन्होंने ई-रिक्शा चलाया। जब आर्थिक संकट और बढ़ गया, तो अपने सपनों को जिंदा रखने के लिए उन्होंने अपना ई-रिक्शा तक बेच दिया।
हालांकि उनका सफर आसान नहीं रहा। National Games में वह तीनों प्रयासों में सफल लिफ्ट नहीं कर पाए, जिसके बाद उन्हें आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। इसी दौरान Paralympic पदक विजेता और Arjuna Award से सम्मानित कोच राजेंद्र सिंह रहलू ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और विशेष प्रयास कर उन्हें SAI Gandhinagar में प्रशिक्षण का अवसर दिलाया।
करीब दो वर्षों की कड़ी मेहनत के बाद झंडू कुमार ने Commonwealth Games में Para Powerlifting का कांस्य पदक जीतकर भारत का गौरव बढ़ाया। हालांकि उनके कोच को आधिकारिक मान्यता नहीं मिलने के कारण वे वार्म-अप एरिया में मौजूद नहीं रह सके। उनका मानना है कि यदि कोच साथ होते, तो गोल्ड मेडल जीतने की संभावना और मजबूत होती।
अब झंडू कुमार की नजरें Asian Games और Ahmedabad Commonwealth Games पर हैं। उनका लक्ष्य भारत के लिए गोल्ड मेडल जीतना है। उनकी प्रेरणादायक यात्रा यह साबित करती है कि कठिन परिस्थितियां भी उस इंसान को नहीं रोक सकतीं, जिसके इरादे मजबूत हों।
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