gtag('config', 'AW-17860304506');

आज से ठीक एक साल पहले जब भारत ने ऑपरेशन सिंदूर की शुरुआत की थी, तो वह केवल एक सैन्य जवाबी कार्रवाई नहीं थी, बल्कि यह भारत की सुरक्षा नीति में आए एक बड़े बदलाव का प्रतीक था. पहलगाम की दुखद घटना ने हमें यह सिखाया कि दुश्मन अब पुराने तरीकों से नहीं, बल्कि हाइब्रिड और तकनीक आधारित तरीकों से हमला कर रहा है.
पिछले 12 महीनों में भारत ने अपनी रक्षा तैयारियों को केवल आधुनिक ही नहीं बनाया, बल्कि उन्हें पूरी तरह स्वदेशी रंग में रंग दिया है. आज भारत की तैयारी ‘पहाड़, बॉर्डर, पानी और हवा’ इन चारों मोर्चों पर ऐसी है कि दुश्मन के लिए सेंध लगाना अब लगभग नामुमकिन हो गया है. इस बदलाव का सबसे बड़ा आधार मेक इन इंडिया और युद्ध मैदान से मिली लर्निंग हैं, जिन्होंने हमारी सेना को एक नई धार दी है.
पहाड़ी युद्ध और सीमा सुरक्षा के मामले में पिछले एक साल में जो सबसे बड़ा सुधार हुआ है, वह है स्वदेशी तकनीक का एकीकरण यानी इंटीग्रेशन. ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारतीय सेना ने महसूस किया कि ऊंचे और कठिन इलाकों में इंसानी नजरों के साथ डिजिटल आंखों की जरूरत है. आज हमारी सीमाओं पर भारत में ही बने ‘तपस’ और ‘आर्चर’ जैसे सशस्त्र ड्रोन चौबीसों घंटे निगरानी कर रहे हैं.
दुर्गम चोटियों पर तैनात जवानों के लिए स्वदेशी इन्फैंट्री प्रोटेक्टेड मोबिलिटी व्हीकल (IPMV) बड़ी संख्या में भेजे गए हैं, जो न केवल बारूदी सुरंगों से सुरक्षित हैं बल्कि कठिन रास्तों पर भी तेजी से हमला करने की क्षमता रखते हैं. इसके अलावा, सेना ने अपनी तोपखाने (Artillery) को पूरी तरह बदल दिया है.
अब हमारे पास K9-वज्र और धनुष जैसी स्वदेशी तोपें हैं, जो ऊंचे पहाड़ों पर सटीक निशाना लगाने में माहिर हैं. अब हमारी तैयारी केवल घुसपैठ रोकने की नहीं, बल्कि दुश्मन की हरकत शुरू होने से पहले ही उसे खत्म करने की है…
खबरें और भी हैं...