
मणिपुर जल रहा है… लेकिन सवाल ये है—आखिर कब तक?
क्यों बार-बार निर्दोष लोग इस हिंसा का शिकार बन रहे हैं?
और सबसे बड़ा सवाल—आखिर सरकार अब तक ठोस कार्रवाई क्यों नहीं कर पा रही?
7 अप्रैल की रात, करीब 1 बजे, एक घर पर रॉकेट गिरता है… एक माँ अपनी आंखों के सामने अपने दो मासूम बच्चों को खो देती है। और फिर अगले ही दिन, वो खुद भी अस्पताल में दम तोड़ देती है। ये सिर्फ एक घटना नहीं है… ये उस सच्चाई का आईना है जिसमें पूरा मणिपुर पिछले कई महीनों से झुलस रहा है।
तो आखिर ये आग बुझ क्यों नहीं रही?
मणिपुर का भूगोल और समाज इस संघर्ष की जड़ है। राज्य का सिर्फ 10% हिस्सा घाटी है, जहां मैतेई समुदाय रहता है, जो आबादी का करीब 57% है। वहीं 90% पहाड़ी इलाकों में कूकी और नागा जैसे जनजातीय समुदाय रहते हैं।
मुद्दा तब और भड़क गया जब मैतेई समुदाय को जनजातीय दर्जा देने की मांग उठी। पहाड़ी समुदायों को डर है कि इससे उनके अधिकार और जमीन खतरे में पड़ जाएंगे।
लेकिन अब सवाल राजनीति पर भी उठ रहा है।
मणिपुर में N. Biren Singh के नेतृत्व में Bharatiya Janata Party की सरकार है।
तो फिर सवाल ये है—जब राज्य में उसी पार्टी की सरकार है जो केंद्र में भी सत्ता में है, तो आखिर इतनी हिंसा के बावजूद सख्त कदम क्यों नहीं उठाए जा रहे?
क्या सरकार हालात संभालने में नाकाम रही है?
या फिर कोई ऐसा दबाव है, जिसके चलते निर्णायक कार्रवाई नहीं हो पा रही?
एक तरफ देश के दूसरे राज्यों में चुनावी रैलियां और प्रचार जोरों पर हैं… लेकिन क्या मणिपुर की आग को उतनी ही प्राथमिकता मिल रही है?
स्थानीय लोगों का आरोप है कि हमलों के पीछे अलग-अलग समुदाय एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं, लेकिन इस blame game के बीच आम जनता सबसे ज्यादा पीड़ित है।
आज मणिपुर सिर्फ जमीन की लड़ाई नहीं… बल्कि पहचान, अधिकार और भरोसे की जंग बन चुका है।
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